अध्याय 2: हल्दीघाटी का रण सूरज की पहली किरण के साथ ही हल्दीघाटी की धरती स्वर्णिम आभा से चमक उठी। लेकिन यह आभा शीघ्र ही रक्त से रंगी जाने वाली थी। आज का दिन केवल एक युद्ध नहीं था, यह स्वाभिमान की परीक्षा थी। यह मातृभूमि के सम्मान की रक्षा का प्रण था। रणभूमि की तैयारी रात्रि के अंधकार में भी मेवाड़ की सेना जाग्रत थी। महाराणा प्रताप अपने शिविर में गहन चिंतन में डूबे थे। उनके सामने मेवाड़ की आन, बान और शान की छवि थी। "क्या हम तैयार हैं?" - उन्होंने धीमे स्वर में पूछा। झाला मान