अध्याय 3: सुकून की कीमतज़ोया ने पैसे तो दे दिए थे, लेकिन उसके कदम अपनी गाड़ी की तरफ नहीं मुड़े। वह वहीं खड़ी रही, उस छोटी सी दुकान को देख रही थी जहाँ मिट्टी के दीये, पुराने ताले और कुछ पीतल के सामान सजे थे। वहां कोई एयर-कंडीशनर नहीं था, कोई मखमली कालीन नहीं था, फिर भी वहां की हवा में एक अजीब सी शांति थी।ज़ोया का सवाल..."अज़ीम," ज़ोया ने पहली बार उसका नाम लिया। "तुम बोर नहीं होते? यहाँ दिन भर बैठे रहना, वही पुराने सामान, वही परिंदे... क्या तुम्हें कभी नहीं लगता कि तुम किसी बड़ी जगह पर