डर स्वेच्छा से बनाया हुआ वो धागा है जो हमेंशर्म और झिझक से बाँधता है।मुझे गाँव पसंद है पर मैं डरता हूँ उनकी सोच से,रीति-रिवाज से, कुंठित विचार से।हालाँकि गाँव में डर हवा की तरह नहीं फैलता,वो कपड़े की तरह सिला जाता है—कभी माँ की हिदायत में,कभी पिता की चुप्पी में,और कभी-कभी भूख से मुँह में आए उल्टी के भाव में।आधे पानी में डूबे मेढ़ पर बहुत-सी कहानियाँ साँस लेती और घोंट दी जाती हैं।________________________मिशा अभी-अभी ही ग्यारह की हुई होगी,पर उसके सपने आसमान से आगे के हैं।“मिशा ओ मिशा,जल्दी आ, अब्बा को रोटी पहुँचा आ।”चौंकते हुए मिशा—“हाँ, आई माँ।”माँ