कुँवर प्रताप चौंक उठे।“क्या? वो लौटी थीं?”राजपुरोहित जी के अधरों पर हल्की, रहस्यमयी मुस्कान तैर गई।“हाँ भाऊजी राज… भोजराज स्वयं उन्हें लेने वृंदावन गए थे।लेकिन… भोजराज के रूप में नहीं।”इतना कहते ही उनकी दृष्टि कहीं अतीत में खो गईवृंदावनघना, शांत जंगल। पास ही बहती निर्मल यमुना।एक शिलाखंड पर बैठी थीं मीरा अपने गिरधर गोपाल की छोटी-सी मूर्ति को गोद में लिए। उनके अधरों पर मधुर भजन था, मानो हर स्वर हवा में घुलकर वृक्षों को भी भक्ति में डुबो रहा हो।तभी पीछे से एक कोमल पर गंभीर स्वर सुनाई दिया “देवि…”मीरा ने पलटकर देखा। एक साधु खड़े थे। तेजस्वी, पर शांत।मीरा