कमरे में हल्की-सी पीली रोशनी जल रही थी।दीवारों पर पुराने पोस्टर टंगे थे और खिड़की के बाहर अंधेरे में कहीं-कहीं मवेशियों की घंटियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।कमरे में एक कोने में बैठा विजय बोतल से शराब का घूंट भरता है और सामने चारपाई पर बैठे अजय सिंह को घूरता है।विजय ने लंबी सांस ली।विजय –"आज यहां आए हमें पूरा एक महीना हो गया अजय…सच कहूं तो तूने मुझे ऐश-आराम की जिंदगी से उठाकर यहां चपरासी बना दिया है।"वो खिड़की की तरफ देखता है।"चारों तरफ बस भैंस… गाय… ऊंट… और उनके गोश्त की बदबू।यार… कैसी लाइफ बना दी है