अहमदाबाद की एक तंग लेकिन जिंदादिल गली में शाम ढल रही थी। नुक्कड़ की चाय की दुकान पर भाप से ज्यादा अफवाहें उड़ रही थीं। प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा गौरव पटेल अपनी किस्मत को कोस रहा था और सामने बैठे कैलाश काका कुल्हड़ में चाय ऐसे सुड़क रहे थे जैसे जिंदगी की सारी कड़वाहट उसी में घोलकर पी जानी हो। गौरव ने धीरे से कहा, “काका, एक छोटा सा ही तो रोल करना है आपको।” काका ने आँखें तरेरीं, “देख बेटा, पिछली बार तूने ‘छोटा सा काम’ बोलकर मुझसे मोहल्ले के चौकीदार को समझाने भेजा था, और