ॐ समुद्र मंथन का आंतरिक दर्शन Vedanta 2.0 अज्ञात अज्ञानी द्वारा "यह कथा सुख-दुख, पाप-पुण्य, ऋण-आवेश और द्वैत की यात्रा की कहानी है।" द्वंद्व का स्वरूप जीवन में हमेशा दो धाराएँ चलती हैं — देव और असुर प्रेम और घृणा सुख और दुख पुण्य और पाप मनुष्य अक्सर इनमें से एक को पकड़ना चाहता है। वह देव को अच्छा और असुर को बुरा मानता है। लेकिन यही भ्रम है। क्योंकि सृजन दो शक्तियों के मिलने से होता है। जब तक द्वैत है, तब तक यात्रा है — मंज़िल नहीं। द्वैत की यात्रा देव और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन करते