एक अधूरा ख़्वाब

(90)
  • 1.6k
  • 483

गाँव की पगडंडियों पर सन्नाटा था, सिर्फ सूखी पत्तियों के उड़ने की आवाज़ आ रही थी। बूढ़ा चित्रकार, जिसे सब 'दादू' कहते थे, अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा ज़ोया का इंतज़ार कर रहा था। ज़ोया, जो पास के शहर के एक अस्पताल में अपनी माँ की दवाइयाँ लेने गई थी। दादू की आँखों में मोतियाबिंद उतर आया था, उन्हें अब धुंधला दिखता था, पर उनके हाथों का जादू कम नहीं हुआ था।दादू ने एक नई कैनवस निकाली। उन्होंने सोचा, "आज ज़ोया आएगी, तो मैं उसे वह आखिरी चीज़ सिखाऊँगा जो मैंने जीवन भर संभाल कर रखी है—कि कैसे रंगों में