मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 42

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रात के दो बजे थे, गाँव के बाहर पुराने श्मशान के पास से संजय अपनी बाइक लेकर गुज़र रहा था। हवा असामान्य रूप से ठंडी थी, जबकि दिन भर चिलचिलाती गर्मी पड़ी थी। सड़क के दोनों ओर सूखे पेड़ ऐसे खड़े थे जैसे काली परछाइयाँ हथेलियाँ फैलाकर उसे रोकना चाहती हों। अचानक बिना किसी वजह के उसकी बाइक झटके खाकर रुक गई, जैसे किसी ने पीछे से पकड़कर जकड़ लिया हो। उसने घबराकर दो‑तीन बार किक मारी, पर इंजन ने कोई जवाब नहीं दिया।तभी उसके पीछे से एक धीमी, ठंडी आवाज़ आई—“मुझे घर छोड़ दोगे…?”संजय के शरीर में सिहरन दौड़