मौन से जागरण तक

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एक गाँव था—छोटा, शांत और अपनी सहजता में अद्भुत।सुबह की पहली किरण जब कच्ची गलियों को छूती, तो लगता जैसे प्रकृति स्वयं वहाँ आशीर्वाद बनकर उतर आई हो।वहाँ की मिट्टी में विश्वास की गंध थी, और लोगों के हृदय में मानवता का स्थायी निवास।समय जैसे वहाँ ठहरकर मुस्कुराता था—न कोई हड़बड़ी, न कोई शोर, बस जीवन अपनी सरल लय में बहता हुआ।किन्तु इस सौम्य विस्तार के केंद्र में एक ऐसा परिवार था, जिसने वर्षों से गाँव की बागडोर अपने हाथों में बाँध रखी थी।उनके आँगन में फैसले होते, और चौपाल तक पहुँचते-पहुँचते वे नियम बन जाते।सत्ता उनके लिए दायित्व कम,