डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 32

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अगली सुबह जब शहर की गलियों में लोग अपने काम के लिए निकल रहे थे, भूपेंद्र अपनी मर्यादा और संस्कारों की पोटली को श्मशान घाट पर छोड़कर सीधे शहर के एक नामी वकील के दफ्तर जा पहुँचा। उसकी आँखों में नींद कम और काया के जिस्म का नशा ज़्यादा था। वह जल्द से जल्द वंशिका के नाम का कांटा अपनी ज़िंदगी से निकाल फेंकना चाहता था।वकील श्रीवास्तव ने चश्मा ठीक करते हुए भूपेंद्र की बात सुनी। "तलाक? देखिए भूपेंद्र जी, यह इतना आसान नहीं होता जितना फिल्मों में दिखता है। अगर आपसी सहमति है, तो प्रक्रिया थोड़ी तेज़ हो सकती