दो शब्द। बहुत सोचने के बाद भी मुझे कुछ नहीं सुझा इसलिए यह कविता लिख रहा हूँ और फिर…. प्रेम परिणय तक नहीं पहुँचता! वह रह जाता है…. उस ललित कुंज के उपवन में, स्मृति बन….! जहाँ नयनों से नयन मिलें थे,चंद्र की दीप्ति में कुसुम खिले थे।वह ललित उपवन बीहड़ बन जाता….! प्रेम फिर परिणय नहीं बनता, वह स्मृति बन जाता सत्यवीर सिंह जेतुंग प्रेम पल्लवी-१ सूरज डूबने में कुछ क्षण शेष थे, सुनहरी किरणें पश्चिम के क्षितिज पर बिखरी नज़र आ रही थी। हवा के झोंके अपने मंद प्रवाह के साथ फूलों की महक ला रहे थे। उन झोंकों में महक भी थी और शीतलता भी। चैत की उदास,