PLATFORM - 2

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Chapter 2: वही रात… फिर सेरात के 11:52।घड़ी की सुई जैसे अटक गई हो।---प्लेटफ़ॉर्म पर ट्यूब लाइट झपक रही थी।एक सेकंड उजाला…अगले सेकंड हल्का अंधेरा।---अंगद खड़ा था।स्थिर।आज वो भाग नहीं रहा था।बस देख रहा था— track train आने की दिशा और… खुद को---“कल जैसा कुछ नहीं होगा…”उसने धीरे से खुद से कहा।पर उसकी आवाज़ में भरोसा नहीं था।---दूर से हेडलाइट दिखी।ट्रेन आ रही थी।धीरे-धीरे…जैसे अंधेरे को चीरती हुई।---धड़… धड़… धड़…आवाज़ पास आती गई।---ट्रेन उसके सामने रुकी।दरवाज़े खुले।---अंगद अंदर चढ़ गया।इस बार बिना भागे।---डिब्बा आधा खाली था।कुछ लोग—एक आदमी सो रहा थाकोई खिड़की के बाहर देख रहा थाएक औरत फोन पर धीमे-धीमे बात कर