गरुड़ लोक में शाम उतर रही थी।सुनहरी रोशनी धीरे धीरे फीकी पड़ रही थी — आसमान में बादल थे — गहरे, भारी। जैसे कुछ आने वाला हो।वर्धान अपने कक्ष की खिड़की के पास खड़ा था।नदी किनारे का वो लम्हा अभी भी दिल में था — प्रणाली का चेहरा, उसकी आवाज़, उसकी भीगी आँखें।"एक बार बता दो कि तुम ठीक हो।"उसने आँखें बंद कर लीं।जाना ही था उसे। यही सही था।तभी —बाहर से एक आवाज़ आई।गरुड़ों का कोलाहल। पंखों की फड़फड़ाहट। और फिर — सब शांत।वर्धान ने आँखें खोलीं।कुछ था — हवा में। एक अजीब सी भारीपन। जैसे तूफ़ान से पहले