Part :11.प्रेम या व्यापार?जिसे तुम प्रेम कहते हो, ज़रा उसकी तह में जाकर देखो,क्या वो रूह का मिलन है, या बस एक गहरा समझौता?तुमने जिसे अपना कहा, क्या उसे सच में जाना है?या अपनी अधूरी हसरतों को, उसके कंधों पर लादना है?एक 'मैं' है, एक 'तू' है, और बीच में भारी दीवार है,दो भूखे मन मिल गए, तो कहते हो कि प्यार है।ये प्यार नहीं, ये एक-दूसरे को खाने की तैयारी है,ये साथ नहीं, ये एक-दूसरे की आज़ादी पर भारी है।तुम चाहते हो वो वैसा हो, जैसा तुम्हारी पसंद है,तो तुमने उसे प्यार कहाँ किया? वो तो तुम्हारी पसंद में