("इस संग्रह की कविताएँ किसी व्यक्ति, धर्म या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं, बल्कि प्रचलित कुरीतियों और अज्ञान पर आत्म-चिंतन के उद्देश्य से लिखी गई हैं। सत्य का मार्ग अक्सर असहज करने वाला होता है।")10. दूध का रंग लाल हैजिसे तुम 'सफेद' समझते हो, ज़रा गौर से उसका रंग देखो,उस अमृत की धार के पीछे, छिपा हुआ वो जंग देखो।वो दूध नहीं, वो लहू है—जो ममता से निचोड़ा गया है,एक माँ का आँचल, ज़बरदस्ती मरोड़ा गया है।तुम कहते हो ये 'पवित्र' है, ये तो देवों का भोग है,पर सच तो ये है कि ये, एक बेजुबान