शब्द और सत्य - भाग 5

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(ये कविताएँ आहत करने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए हैं।कुरीतियों और अज्ञान पर प्रश्न उठाना ही इनका उद्देश्य है।सत्य कभी-कभी असहज होता है।)13. आज़ादी: लिबास की या रूह की?जिसे तुम आज़ादी कहती हो, क्या वो बस मनमानी है?या पुराने पिंजरे को छोड़, नई बेड़ियाँ पहचानी हैं?तुमने पुरुषों जैसा चोला पहन, सोचा कि तुम मुक्त हुई,पर ध्यान से देखो! तुम तो बस एक और सांचे में नियुक्त हुई।सच्ची स्वतंत्रता बाहर नहीं, वो तो भीतर की एक क्रांति है,कि तुम 'मांस का लोथड़ा' नहीं हो, ये सबसे बड़ी भ्रांति है।जब तक तुम खुद को 'बेटी, पत्नी या माँ' में ही