इश्क और अश्क - 80

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तलवार अभी भी वर्धान की गर्दन पर थी।पारस की आँखें — गुस्से से भरी।वर्धान ने हिलने की कोशिश नहीं की।बस — शांत आवाज़ में बोला —"सुनो।""पहले सुनो। फिर जो चाहो करो।"पारस की पकड़ ढीली नहीं हुई — पर वो चुप रहा।वर्धान ने एक गहरी साँस ली —"मैं इस दुश्मनी को खत्म करना चाहता हूँ।""दोनों लोकों के बीच जो पीढ़ियों से चला आ रहा है — वो मेरे राज में नहीं चलेगा।"पारस ने उसे देखा — आँखों में सवाल था।"बड़ी अच्छी बातें हैं।" — उसकी आवाज़ में व्यंग्य था — "पर तुमने मेरी बहन के साथ जो किया—""वो मैं जानता हूँ।"