पहला दिन शहर में !!

(144)
  • 792
  • 2
  • 330

      कदम बस से उतरी ! अकेले दुनिया बड़ी लगने लगी , मानो कि किस मेले में आ गए हो। नजर चारों ओर फेरने में लगी थी! मै तो यही सोच रही थी कि अब आजादी से जिऊंगी लेकिन, क्या पता था कि आगे ऐसा हाल होगा....!!      तोह मैं पढ़ाई को जारी करने के लिए शहर में प्रवेश करने की घर से अनुमति लेकर रवाना हुई। दुनिया बहुत बड़ी और सुखदाई लगने लगी थी। शुरुवात की आजादी और अकेलापन की चाहत खुद मै ऐसी खुशी दे रही थी , जैसे कि सदियों से बंधे परिंदा पिंजरा