इश्क और अश्क - 87

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तलवार हवा में थी।सब कुछ एक पल में हुआ।परास ने देखा और चिल्लाया :"वर्धान—!"पर वर्धान मुड़ा नहीं।वो मुड़ नहीं पाया।तलवार आई —और उसकी पीठ में उतर गई।एक पल की चुप्पी।जैसे पूरी दुनिया ने साँस रोक ली।वर्धान के पैर काँपे।घुटना ज़मीन पर टेका।एक हाथ ज़मीन पर।सिर झुका।परास दौड़ा।"वर्धान—!"वो उसके पास पहुँचा। उसे थामा।वर्धान ने उसका हाथ पकड़ा —"परास।" आवाज़ में दर्द था। पर घबराहट नहीं।"चुप रहो। उठो। मैं हूँ।" परास का गला भर्रा गया।"अविराज—" वर्धान ने कहा।"गया। गुफा की तरफ़।""ठीक है।""ठीक है क्या — तुम्हारी पीठ में—""परास।"वर्धान ने उसे देखा।उन आँखों में —एक अजीब सी शांति थी।कनिष्क धीरे-धीरे आगे आ रहा