हमारे घर से कुछ ही दूरी पर रेल की कुछेक पटरियां थीं और जिन पर ना जाने कौन कौन सी कितनी ट्रेनें हर वक्त बेवक्त गुजरती रहती थीं। सुबह सबेरे और आधी रात के वक्त के गुजरने के बाद ही वहाँ पर से गुजरती उन चंद एक ट्रेनों की पुरज़ोर हुंकारें और ताबड़तोड़ आवाज करते पूरी रफ़्तार से सरपट दौड़ते पहियों का कर्ण भेदी संगीत जी को बड़ा परेशान करते थे। उन घड़ियों में ही नींद का जोर होता था और उन ट्रेनों की वजह से नींद उचट जाती थी और एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् फिर से सो पाना