शब्द और सत्य - भाग 8

  • 141
  • 51

22.कमजोरी का मोह छोड़ोकमजोरी कोई मजबूरी नहीं,यह तुम्हारा चुना हुआ एक बहाना है,ताकि सत्य के सामने खड़ा न होना पड़े,ताकि खुद को बदलने का श्रम न करना पड़े।तुम कहते हो 'मैं असहाय हूँ',पर सच तो यह है कि तुम डरे हुए हो,अपनी ही बनाई हुई बेड़ियों से,अपनी ही छोटी-सी पहचान को पकड़े हुए हो।जिसे तुम विनम्रता कहते हो,वो अक्सर तुम्हारी कायरता होती है,जो लड़ने से कतराता है खुद के ही झूठ से,उसी के भीतर कमजोरी की जड़ें गहरी होती हैं।उठो! और देखो इस मन के खेल को,शक्ति बाहर से कहीं उधार नहीं आएगी,जिस क्षण तुम 'बेचारे' बनने का सुख त्याग