शब्द और सत्य - भाग 9

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25.खुद को मत बेचोसजी हुई इन बाज़ारों में,तुम अपनी कीमत मत लगवाना,रिश्तों के, रिवाजों के नाम पर,तुम खुद को गिरवी मत रख जाना।तुम देह नहीं, तुम चेतना हो,पर तुम्हें 'सुंदरता' में बाँध दिया,एक रंग, एक रूप, एक जेवर देकर,तुम्हें वस्तु की तरह छाँट दिया।किसी की 'इज्ज़त' का भार लिए,किसी की 'पसंद' का श्रृंगार लिए,तुम कब तक सड़कों पर चलोगी,एक पराया, झूठा संसार लिए?मत बेचो अपनी बुद्धिमत्ता को,कि कोई तुम्हें 'घरेलू' कहे,मत मारो अपनी उस आवाज़ को,कि कोई तुम्हें बस 'कोमल' कहे।प्यार के नाम पर जो मांगता है समर्पण,वो अक्सर बस तुम्हारा शिकार करता है,जो तुम्हारी चेतना को न जगा सके,वो