मेहरा मेंशन की सुबह आज कुछ ज्यादा ही हलचल भरी थी. गायत्री दादी अब बिना सहारे के हॉल तक आने लगी थीं, और इसका पूरा श्रेय सिया की उस कडी मेहनत और दिन- रात की थेरेपी को जाता था. बलराज दादाजी के चेहरे पर बरसों बाद एक सुकून वाली मुस्कान थी,पर इस सुकून के नीचे एक बहुत बडी आग सुलग रही थी. काम्या बुआ, जो सुबह से ही घर से गायब थीं, वो किसी पार्टी की शॉपिंग करने नहीं, बल्कि सिया की जडों को खोदने निकली थीं. उन्हें यकीन था कि इस मासूम चेहरे के पीछे कोई न कोई काला