लखनऊ की नवाबी शाम अपनी पूरी रंगत में थी, पर कबीर मेहरा के लिए इस शहर की हर आवाज एक शोर की तरह थी. दिल्ली की बडी- बडी सडकों पर राज करने वाला कबीर आज चौक की उन संकरी और बदबूदार गलियों में खुद को बेबस महसूस कर रहा था. उसके महंगे जूतों पर लखनऊ की धूल जम चुकी थी और माथे पर पसीने की बूंदें, पर उसकी नजरें सिर्फ एक बोर्ड ढूँढ रही थीं—' सेवा सदन' कबीर यहाँ किसी प्यार की तलाश में नहीं आया था, कम से कम वो खुद को तो यही समझा रहा था.उसके आने की