फार्महाउस के बाहर बिजली अभी भी कडक रही थी, लेकिन कबीर मेहरा के भीतर जो तूफान उठ रहा था, वह उस आसमानी बिजली से कहीं ज्यादा घातक और विनाशकारी था. सिया के जाने के बाद हॉल में पसरा सन्नाटा कबीर को किसी जहरीले सांप की तरह डस रहा था. उसे रह- रहकर सिया का वो चेहरा याद आ रहा था—आंसुओं से भीगा हुआ, लेकिन स्वाभिमान से तना हुआ.कबीर ने अपने हाथ की मुट्ठी पूरी ताकत से दीवार पर दे मारी, जिससे वहाँ लगा कीमती प्लास्टर झड गया. उसका खून खौल रहा था, खुद पर नहीं, बल्कि उस सडे हुए तंत्र