बारिश उस शहर की आदत थी।हर शाम आसमान ऐसे बरसता था जैसे उसे भी किसी का इंतज़ार हो।रिया अपनी खिड़की के पास बैठी थी।टेबल पर रखी कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी, लेकिन उसके हाथ अब भी कप को पकड़े हुए थे।उसकी आँखों के सामने बस दो चेहरे घूम रहे थे।आरव…और कबीर।दो नाम।दो एहसास।दो अधूरी दुनियाएँ।कभी-कभी जिंदगी इंसान को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।रिया भी उसी मोड़ पर थी।उसने खुद से हजार बार कहा था कि कबीर अब सिर्फ अतीत है।एक ऐसा अतीत जिसे याद