धनबाद उस समय सिर्फ एक शहर नहीं था—वह कोयले, धुएँ, पसीने और बीमारी से बना एक जीवित नरक था।धरती के नीचे साँस लेते मजदूर,ऊपर भूख से लड़ते परिवार,और चारों ओर टीबी का भय।अविभाजित बिहार के दिनों में जब कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, तब दूर-दूर के गाँवों से पासी, मुसहर, भुईयाँ, संताली, मुंडा, उराँव और बावरी समुदाय के लोग रोजगार की आस में धनबाद आ पहुँचे।किसी ने खेत छोड़ा,किसी ने जंगल,किसी ने पुश्तैनी मिट्टी।पर यहाँ उन्हें मिला क्या?टीन की तपती छतें,सड़ी नालियाँ,खदानों से निकला जहरीला पानी,और अंधेरी सुरंगों में मौत से रोज़ का सामना।उस समय ओपन कास्ट खदानें कम थीं।अधिकतर डोली