34.यह 'एक दिन' तुम्हारी मौत का दिन है!तुम कहते हो, "एक दिन बदलूँगा दुनिया," पर वह दिन कभी आता क्यों नहीं?भीतर जो सड़ रहा है ढोंग का ढेड़, वह तुम्हें कभी नजर आता क्यों नहीं?'एक दिन'—यह तुम्हारी चेतना का सबसे बड़ा और शातिर झूठ है,सत्य से भागने के लिए, तुम्हारे आलसी मन को मिली खुली छूट है।तुम दुनिया बदलने निकले हो, जबकि खुद अपनी ही वासनाओं के गुलाम हो,बाजार के इशारे पर नाचते हो, और दावों में बड़े-बड़े महापुरुष के नाम हो।अभी जो विकृति है तुम्हारे भीतर, उसे तुम आज, इसी क्षण नहीं बदलते,और उम्मीद करते हो कि कल कोई