मेरी डिग्री बेकार नहीं है

(14)
  • 708
  • 1
  • 207

---*मेरी डिग्री बेकार नहीं है *लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*वो एक गुनगुनी धूप से सजी सुबह थी। फरवरी माह की महकती सुबह। ठंडी हवाएं शरीर को छूती हुई अच्छी लग रही थीं। धूप अभी इतनी तेज नहीं थी। पक्षी कोई अनोखे स्वर गा रहे थे। सुहानी एक कप कॉफी लेकर अपनी बालकनी में बैठी अपने पौधों को निहार रही थी। गेंदा-गुलाब के फूल महक रहे थे। तुलसी के पौधे से पावन सुगंध आ रही थी। प्रकृति की सुंदरता में खोई सुहानी अपनी अतीत की यादों में चली जाती है।सुहानी की शादी फरवरी माह में हुई थी। बड़ा उमंग और उल्लास का मौसम