अधूरी कॉल

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मैं बैठा कुछ सोच ही रहा था कि तभी मेरे पीछे रखे मोबाइल से एक जानी-पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी। देखा तो घर से फोन आ रहा था—फोन पर वही लोग थे जो समय-समय पर अपनी कामनाओं की 'अपडेट' लेते रहते हैं। मैं समझ गया था कि आज भी वही होगा जो सालों से होता आया है।मैंने फोन उठाया, "हेलो।"वहाँ से बड़ी क्रुद्ध सी आवाज़ आई, "तुम पागल हो गए हो क्या?"मैं कुछ पल ठहरा और बोला, "नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।"मेरे इतना बोलते ही उनका जवाब आया, "तुम फोन क्यों नहीं लगाते हो? कई-कई हफ्तों तक बात नहीं करते!