Part 10 का अगला पन्ना खोलते ही मेरा दिल फिर से तेज़ धड़कने लगा।पता नहीं क्यों...जैसे-जैसे मैं इस कहानी में आगे बढ़ रही थी, मुझे बार-बार ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं इन बातों को सिर्फ़ पढ़ नहीं रही...बल्कि कहीं न कहीं इन्हें महसूस भी कर रही हूँ।कुछ पंक्तियाँ तो ऐसी थीं जिन्हें पढ़कर लगता था कि मैं पहले भी इन्हें जानती थी।लेकिन कैसे?इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था।मैंने सिर झटककर फिर से पढ़ना शुरू किया।"मेरे भाई आनंद के उपनयन संस्कार का दिन आ चुका था।"सुबह से ही घर में बहुत चहल-पहल थी।सब लोग तैयार होकर जानकी मंदिर