तुम्हारे हिस्से का मौन मेरे हिस्से में आया.... और तेरा मन मेरे मन को भाया.....यामिनी की मृत्यु के सातवें दिन घर में अब पहले की तरह सन्नाटा नहीं रहा था।लोग थे,रिश्तेदार थे,बर्तन खनक रहे थे।धीमी आवाज़ों में बातचीत हो रही थी।लेकिन तारा को लग रहा था कि घर पहले से कहीं अधिक खाली हो गया है।शायद इसलिए क्योंकि कुछ लोग घर में नहीं रहते।वे घर ही होते हैं।यामिनी ऐसी ही थीं।उनकी धीमी आवाज़,सुबह की चाय,बरामदे में रखा उनका झूला,अधूरी पढ़ी किताबें।सब कुछ जैसे अभी भी वहीं था।फिर भी कुछ नहीं था।दोपहर के समय तारा उनकी अलमारी साफ़ करने लगी।माँ ने