खामोश घर की व्यथा

  • 153
  • 1

खामोश घर की व्यथाप्रिय पाठकों, क्या मेरी कहानी सुनोगे? मैं अब एक 45 वर्षीय इमारत हूँ। कभी मैं भी घर हुआ करता था। घर तो उसमें रहने वाले व्यक्तियों से ही बनता है ना, बिना सदस्यों के तो दीवारें ही हैं। कभी मेरे आँगन में भी बचपन खेलता था।बात उस समय की है जब मेरा निर्माण शुरू हुआ। एक युवा अथर्व अपनी बीबी के साथ रहने मेरे आँगन आया था। उस समय मेरा स्वरूप ऐसा नहीं था। करीब दो सौ गज का एक प्लाट था। अथर्व ने अपनी मेहनत से उसमें एक कमरा बनाया था। हाँ, मुझे पक्का याद है।