प्यार की परीभाषा - 10

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शादी का दिन सुबह का समय था मंदिर के आँगन में हल्की धूप उतर रही थी हवा में अगरबत्ती और फूलों की मिली-जुली खुशबू थी कोई शोर-शराबा नहीं… न ढोल, न बैंड… बस मंत्रों की धीमी गूंज और कुछ गिने-चुने लोग।सब कुछ वैसा ही था जैसा तुषार चाहता था साधारण, शांत लेकिन भीतर की हलचल किसी को नहीं दिख रही थी मंदिर के एक कोने में तुषार खड़ा था सफेद धोती-कुर्ता पहने, माथे पर हल्का सा तिलक लेकिन चेहरे पर कोई खुशी नहीं, सिर्फ एक दबा हुआ तनावउसके हाथ आपस में बंधे हुए थे, उंगलियाँ बार-बार एक-दूसरे को कस रही