गोकुल में यमुना किनारे कुम्हारों की वह गली आज भी वैसी ही है। सुबह-सुबह जब घाट पर शंख बजता है, तो चाकों की घर्र घर्र उसी लय में मिल जाती है, जैसे नदी खुद साँस ले रही हो। उसी गली के नुक्कड़ पर इरा का आँगन था, नीम की छाँव वाला, जहाँ धूप आँगन में बिछी रहती और हवा में हमेशा गीली मिट्टी की सोंधी गंध बसी रहती।मैं, निहार, देहरादून से आया था। उम्र चालीस के करीब, एक पुरानी पब्लिक लाइब्रेरी में पांडुलिपि संरक्षक। मेरी दुनिया फाइल नंबरों, रुई के दस्तानों और पीली पड़ गई पोथियों की थी। ब्रज के