अध्याय 2: पुस्तकालय और लड़काज़िला पुस्तकालय हवेली से तीन किलोमीटर दूर था। पुरानी इमारत, टूटी सीढ़ियाँ, पंखे जो आवाज़ करते हुए चलते थे। पर गौरी के लिए वह पूरी दुनिया थी।वह हफ़्ते में दो बार जाती, बहाना बना कर, “मंदिर जा रही हूँ” या “सहेली से मिलने।” ड्राइवर को छुट्टी दे देती, पैदल जाती। कोई पूछता तो कहती घूमने निकली थी।वहीं उसकी मुलाक़ात आरव से हुई।कुर्ता पजामा, हवाई चप्पल, आँखों में एक आग जो गौरी ने पहले कभी किसी में नहीं देखी थी। उसके बाबा मज़दूर थे, गुज़र गए थे जब आरव बारह साल का