कशमकश - 2

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2.1. यादों का आँगन और मौसी का दुलारअजय जब मौसी के घर पहुँचा, तो दिल में एक अजीब-सी राहत उतर आई। दरवाज़ा खुलते ही मौसी की मुस्कान सामने थी — वही झुर्रियों भरी, सच्ची मुस्कान, जो हमेशा बिना कुछ कहे भी सब कह देती थी।“आ गया बेटा? चल, अंदर आ… तेरे लिए चाय रखी है।”घर में कदम रखते ही पुरानी महक ने उसे घेर लिया — आँगन में रखी तुलसी की मिट्टी, दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें, और वो घड़ी जो हमेशा थोड़ी तेज़ चलती थी।अजय सोफ़े पर बैठा तो मौसी ने हाथ से चाय का प्याला पकड़ाया। हर घूँट