खिचड़ी की राम कथा

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काव्य संग्रह : 'खिचड़ी' की राम कथा खिचड़ी केवल भोजन नहीं, संस्कृति है। यूपी की मिट्टी की सौंधी खुशबू है। अमीर-गरीब, बच्चे-बूढ़े, स्वस्थ-बीमार - सबको भाने वाली। झट से बनने वाली, सबको तृप्त करने वाली। ठीक वैसे ही इस संग्रह की कविताएँ हैं - सरल, सहज, सुपाच्य और संस्कारों से भरपूर।  इस 'खिचड़ी की राम कथा' में क्या-क्या है?  1. 'खिचड़ी की राम कथा' - हास्य का तड़का  एक विदेशी यूपी आया, खिचड़ी खाई, नाम भूल गया। फिर 'खा चिड़ी, उड़ चिड़ी' रटते-रटते पिटता रहा। अंत में जब 'खिचड़ी' याद आई तो खुशी से 'जय श्री राम' बोल उठा। यह कविता हँसाते-हँसाते सिखाती है