Devil की दास्तान - 27

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रात का समय है। हवेली में गहरा सन्नाटा है।बाहर तेज़ हवा चल रही है, बादलों के बीच से कभी-कभी चाँद झाँकता है।)(करण अपने कमरे में अकेला बैठा है।आईने के सामने, जहाँ उसका प्रतिबिंब बार-बार धुंधला पड़ता है —कभी इंसान की तरह, कभी किसी शैतान की तरह।)करण (अपने आप से, बुदबुदाते हुए) बोला - “क्यों नहीं निकल रही वो यहाँ से?...क्यों उसका चेहरा बार-बार मेरी आँखों के सामने आता है?...वो इंसान है... और मैं...”(उसकी आँखें धीरे-धीरे लाल होने लगती हैं।आईने में उसका चेहरा बदलता है — तेज़ दाँत, लाल आँखें, और डरावना रूप।)शैतानी आवाज़ (करण के अंदर से) बोली - “तू भूल गया