कर लो बात

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मन की बात और सुनो'मैं सड़क हूँ' ने कहा था - "मैं सबकी हूँ, पर मेरी कोई नहीं।"  ठीक वैसे ही हास्य है।  हँसी सबकी है, पर हँसी की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।  लोग कहते हैं - "अरे, मजाक था यार।"  पर मजाक ही तो सबसे बड़ा सच बोल जाता है।  ये कविताएँ चुटकुले नहीं हैं।  ये वो ठहाके हैं जो गले में अटक जाते हैं।  क्योंकि हँसते-हँसते आप पहचान जाते हैं कि बात तो आपके ही घर की हो रही है।  यहाँ 'हाथी और छह अंधे' सिर्फ जानवर की कहानी नहीं है।  ये सास-बहू, भाई-भाई, ननद-भाभी की वो रोज की 'व्याख्या' है, जहाँ हर कोई अपना सच पकड़कर