शब्द और सत्य - भाग 13

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37. जलती धरती, सोता इंसानधरती की छाती सुलग रही,नदियों का पानी सूख रहा,तेरी वासना की भट्ठी में,हर जीव तड़पकर कूक रहा।पर तू अपनी ही बेहोशी में,सुख के झूठे सपने बुनता,गुरु पुकार कर हार गए,तू एक शब्द भी नहीं सुनता!जाग! ओ सोने वाले इंसान!तेरा यह कैसा मरण-विश्राम?भौतिकता की इस अंधी दौड़ में,तूने प्रकृति को बाज़ार किया,भोग लिया इस वसुंधरा को,हर कतरे को लाचार किया।महल खड़े हैं कंक्रीट के,चेतना पर गहरी धूल जमी,सांसें बिकती हैं सिलेंडरों में,पर तुझमें ना कोई तड़प जगी!तू सोता है कलयुग के पालने में,धरती जलती है महाविनाश की आग में।यह कैसी तेरी मायावी निद्रा,यह कैसा तेरा अहंकार?जब तक