बचपन की वो मासूम यादें आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं, लेकिन कहानी का असली मोड़ तो तब आया जब हम बड़े हुए। उन दिनों, फेसबुक पर हुई वो पहली मुलाकात के बाद, मैं और कान्हा दो अलग ध्रुवों (poles) की तरह थे।मैं अक्सर कान्हा से बात करने में बहुत कंजूसी करती थी। मेरे जवाब छोटे, रूखे और कभी-कभी तो बस एक शब्द के होते थे— 'हूँ', 'हाँ', या 'ठीक है'। मुझे नहीं पता था कि मैं ऐसा क्यों कर रही थी—शायद एक दीवार खड़ी कर रही थी या शायद मुझे उस वक्त इस रिश्ते की गहराई का अंदाजा नहीं