सुबह के सात बज रहे थे।चंदनगढ़ की सुबह दिल्ली जैसी नहीं थी।दिल्ली की सुबह शोर के साथ जागती है, लेकिन यहाँ सुबह बिना किसी आवाज़ के उतरती थी। इतनी खामोशी थी कि लगता था जैसे पूरा कस्बा अब भी नींद में हो।अवंतिका की आँख खुली तो कमरे में हल्की-सी धूप परदों से छनकर अंदर आ रही थी।वह धीरे से उठकर बैठ गई।अचानक उसे रात की वह आवाज़ याद आई..."अवंतिका..."उसने सिर झटक दिया।"शायद सपना था..." उसने खुद से कहा।लेकिन एक चीज़ सपना नहीं थी।वह मैसेज।उसने तुरंत अपना फोन उठाया और स्क्रीन ऑन की।मैसेज अब भी वहीं था।"काली कोठी में मत आना।"अवंतिका