काली रात का श्रृंगार

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बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव था। उस गाँव की सुबहें हमेशा खुशियों से भरी होती थीं। सूरज की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, चारों तरफ सुनहरी चमक फैल जाती। किसान हल लेकर अपने खेतों की ओर निकल पड़ते, बच्चे हँसते-खेलते गलियों में दौड़ते, और औरतें कुएँ से पानी भरते हुए आपस में हँसी-मज़ाक करती थीं। शाम होते ही पूरा गाँव चौपाल पर इकट्ठा होता। कोई ढोलक बजाता, कोई लोकगीत गाता, तो कोई बच्चों को पुरानी कहानियाँ सुनाता। गाँव में ऐसा अपनापन था कि हर किसी के सुख-दुख में