शाम धीरे-धीरे ढल रही थी।पूरा दिन जैसे आँसुओं में भीगकर निकल गया। अब आँखें तो सूख चुकी थीं, लेकिन मन अब भी उतना ही भारी था। कभी-कभी ऐसा लगता है कि इंसान रोते-रोते थक तो जाता है, पर उसके अंदर का दर्द थकना नहीं जानता।सोचा था कि थोड़ी देर के लिए फोन उठा लूँ। शायद कोई अच्छी-सी वीडियो देख लूँ, कोई गाना सुन लूँ, या बस कुछ पल के लिए खुद को भूल जाऊँ। लेकिन जैसे ही एक गहरी साँस ली, घर में फिर किसी ने आवाज़ लगा दी। कोई काम, फिर दूसरा काम, फिर तीसरा… कभी-कभी लगता है कि