अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 9

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**भाग नौ: शिकवे और आँसू**उस विशाल गलियारे में, पल्लवी के कमरे का वह भारी ओक का दरवाज़ा किसी ठोस दीवार की तरह खड़ा था। कबीर उस दरवाज़े के ठीक सामने आकर रुक गया। उसने एक गहरी सांस ली, अपने हाथों को मुट्ठी में बांधा और बहुत ही भारी आवाज़ में पुकारा, "पल्लवी..."दरवाज़े के उस पार कोई हलचल नहीं हुई।कमरे के अंदर, पल्लवी अपने विशाल बिस्तर के किनारे, फर्श पर घुटनों को मोड़कर बैठी थी। उसका चेहरा आंसुओं से चिपका हुआ था, बाल बिखरे थे और होंठ सूख चुके थे। पिछले चौबीस घंटों से वह उसी एक जगह पर बैठी थी।