भूख

दिसंबर के अंतिम सप्ताह की वह रात हड्डियाँ जमा देने वाली थी। ठंड ऐसी कि लगता था नसों में दौड़ता हुआ खून भी कहीं रुक-रुक कर चल रहा हो। चारों ओर कोहरा इस तरह पसरा था, मानो धरती ने सफ़ेद चादर ओढ़ ली हो। सड़क, पेड़, बिजली के खंभे..सब धुंध की परतों में खोए हुए थे।मैं पहली फैक्ट्री से दूसरी फैक्ट्री की ओर निकल पड़ा था। दोनों के बीच मुश्किल से पाँच किलोमीटर की दूरी रही होगी, लेकिन उस रात हर मीटर किसी अनजाने सफ़र जैसा लंबा लग रहा था। स्वेटर, कोट और मफलर में खुद को समेटे मैं धीरे-धीरे