भीड़ में अकेली - 3

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अध्याय–3 : चैट की आदत     कहते हैं कि मनुष्य किसी भी आदत का बंदी बन सकता है। किसी को चाय की आदत होती है, किसी को किताबों की, किसी को सन्नाटे की और किसी को किसी एक आवाज़ की। उमा को अब हर सुबह मोबाइल की स्क्रीन देखने की आदत होने लगी थी। महेश रोज़ की तरह सात बजे घर से निकल जाता। उसके जाने के कुछ मिनट बाद मोबाइल की स्क्रीन जगमगा उठती—"सुप्रभात, उमा! आज सूरज देखा?"पहले-पहल उमा केवल दो-तीन शब्दों में उत्तर देती थी।"हाँ।""जी।""ठीक हूँ।"लेकिन धीरे-धीरे उन छोटे उत्तरों ने वाक्यों का रूप ले लिया। अब वह