वाराणसी से कोई मिलने आया? अपने अभिवादन के साथ ही उषा पिता से पूछ बैठी । बल्लियों उछल रहे अपने दिल को और संभालना उस के लिए कठिन था। “पहले कहीं एकांत में बैठ न लें?” बेटी के भावतरंग से निहाल चंद अछूते रहे। यों भी वैयक्तिक भावप्रवणता को सार्वजनिक बनाने से वह कतराते थे। “चलिए, सामने वाले लौन की किसी खाली बैंच पर बैठ लेते हैं,” उषा इधर बेगाने इस शहर में अपनी एम.डी.